Marknadens största urval
Snabb leverans

Böcker utgivna av Rajkamal Prakashan Pvt. Ltd

Filter
Filter
Sortera efterSortera Populära
  • - Sampurna Sansar Ke Liye Naitikta
    av Dalai Lama
    415,-

  • - Pratinidhi Chayan 1850 Se Ab Tak
    av Amrendra Nath Tripathi
    469

  • - Ek Prem Katha
    av Tarun Bhatnagar
    445

  • av Sanjeev
    445

  • av Uma Shankar Choudhary
    445

  • av Sudhanshu Firdaus
    415,-

  • av Charan Singh Pathik
    415,-

  • - Swarndesh Ki Lok Kathayen
    av Manoj Kumar Pandey
    415,-

  • av Prakash Uday
    415,-

  • av Anamika
    469

  • av Giriraj Kishor
    445

    'आंजनेय जयते' गिरिराज किशोर का सम्भवत पहला मिथकीय उपन्यास है। इसकी कथा संकटमोचन हनुमान के जीवन-संघर्ष पर केन्द्रित है। रामकथा में हनुमान की उपस्थिति विलक्षण है। वे वनवासी हैं, वानरवंशी हैं, लेकिन वानर नहीं हैं। बल्कि अपने समय के अद्भुत विद्वान, शास्त्र-ज्ञाता, विलक्षण राजनीतिज्ञ और अतुलित बल के धनी हैं। उन्होंने अपने समय के सभी बड़े विद्वान ऋषि-मुनियों से ज्ञान हासिल किया है। उन्हें अनेक अलौकिक शक्तियाँ हासिल हैं। तमाम साहित्यिक-सांस्कृतिक स्रोतों के माध्यम से गिरिराज किशोर ने हनुमान को वानरवंशी आदिवासी मानव के रूप में चित्रित किया है, जो अपनी योग्यता के कारण वानर राजा बाली के मंत्री बनते हैं। बाली और सुग्रीव के बीच विग्रह के बाद नीतिगत कारणों से वे सुग्रीव की निर्वासित सरकार के मंत्री बन जाते हैं। इसी बीच रावण द्वारा सीता के अपहरण के बाद राम उन्हें खोजते हुए हनुमान से मिलते हैं। हनुमान सीता की खोज में लंका जाते हैं। सीता से तो मिलते ही हैं, रावण की शक्ति और कमजोरियों से भी परिचित होते हैं। फिर राम-रावण युद्ध, सीता को वनवास, लव-कुश का जन्म और पूरे उत्तर कांड की कहानी वही है-बस, दृष्टि अलग है। लेखक ने पूरी रामकथा में हनुमान की निष्ठा, समर्पण, मित्रता और भक्तिभाव का विलक्षण चित्र खींचा है। उनकी अलौकिकता को भी महज कपोल-कल्पना न मानकर एक आधार दिया है। लेखक ने पूरे उपन्यास में उन्हें अंजनी-पुत्र आंजनेय ही कहा है, उनकी मातृभक्ति के कारण उपन्यास में सबसे महत्त्वपूर्ण उत्तरार्ध और क्षेपक है जो शायद किसी राम या हनुमान कथा का हिस्सा नहीं। यहाँ हनुमान सीता माता के निष्कासन के लिए राम के सामने अपना विरोध जताते हैं और उन्हें राजधर्म और निजधर्म की याद दिलाते हैं। यहाँ यह कथा अधुनातन सन्दर्भों में गहरे स्तर पर राजनीतिक हो ज

  • av Shrilal Shukla
    399

  • av Shazi Zaman
    515,-

  • av Ramdhari Singh Diwakar
    485

    गाँव की टूटती-बिखरती समाजार्थिक व्यवस्था में छीजते जा रहे मानवीय मूल्यों को कथान्वित करने वाला यह उपन्यास दाखिल खारिज रामधारी सिंह दिवाकर की नवीनतम कथाकृति है। अपने छूटे हुए गाँव के लिए कुछ करने के सपनों और संकल्पों के साथ प्रोफेसर प्रमोद सिंह का गाँव लौटना और बेरहमी से उनको खारिज किया जाना आज के बदलते हुए गाँव का निर्मम यथार्थ है। यह कैसा गाँव है जहाँ बलात्कार मामूली-सी घटना है। हत्यारे, दुराचारी, बलात्कारी और बाहुबली लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र को अपने हिसाब से संचालित करते हैं। सुराज के मायावी सपनों की पंचायती राज-व्यवस्था में पंचायतों को प्रदत्त अधिकार धन की लूट के स्रोत बन जाते हैं। सीमान्त किसान खेती छोड़ 'मनरेगा' में मजदूरी को बेहतर विकल्प मानते हैं। ऐसे विकृत-विखंडित होते गाँव की पीड़ा को ग्रामीण चेतना के कथाशिल्पी रामधारी सिंह दिवाकर ने पूरी संलग्नता और गहरी संवेदना से उकेरने का प्रयास किया है। हिन्दी कथा साहित्य से लगभग बहिष्कृत होते गाँव को विषय बना कर लिखे गए इस सशक्त उपन्यास को 'कथा में गाँव के पुनर्वास' के रूप में भी देखा-परखा जाएगा, ऐसी आशा है।

  • av Asghar Wajahat
    459

  • av Krishna Sobti
    385,-

  • av Bhagwati Charan Verma
    399,-

  • av Abhiram Bhadkamkar
    539,-

    बालगंधर्व-मराठी संगीत-रंगमंच के देदीप्यमान नक्षत्र ! अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में सिर्फ और सिर्फ कलाकार । भूमिकाओं को ओढ़कर नहीं, अपनी आत्मा की गहराइयों से उगाकर जीने वाले अभिनेता, पुरुष होते हुए जिनकी स्त्री-भूमिकाएँ महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए सौन्दर्य-चेतना की प्रेरक बनी, मंच पर जिनकी वेशभूषा को देखकर स्त्रीयों ने अपना पहनावा, अपना साज़-श्रृंगार दुरुस्त किया और युवकों में अपनी पुरुष-देह को स्त्री-रूप में देखने का फैशन ही चल पडा । ऐसे बालगंधर्व जो सिर्फ कलाकार नहीं, अपने चाहने वालों के लिए देवता थे, जिन्हें साठ वर्ष की आयु में भी लोगों ने उतने ही प्रेम से, उतनी ही श्रद्धा से देखा जितने चाव से युवावस्था में देखा-सुना । यह उपन्यास उन्ही नारायण श्रीपाद राजहंस की जीवन-कया है जिन्हें बहुत छोटी अवस्था में गाते सुनकर लोकमान्य तिलक ने बालगंधर्व की उपाधि से विभूषित किया और बाद में जो इसी नाम जाने जाते रहे । उपन्यास में लेखक ने उनके जीवन के तमाम उपलब्ध तथ्यों को उनके कला तथा निजी जीवन के विवरणों के साथ संगुम्फित किया है; गहरे आत्मीय भाव के साथ उन्होंने भारतीय शास्त्रीय रंगमंच के उस व्यक्तित्व के अरन्तरिक और बाह्य जीवन को उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक परिपेक्ष्य के साथ इस तरह चित्रित किया है कि बालगंधर्व अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में हमें अपने सामने खड़े दिखने लगते हैं । उनके जीवन के स्वर्णकाल क्रो देख हम चकित होते हैं और बाद में जब उनका जीवन नियति की विडम्बनाओँ की लहरों पर बहने लगता है, हम अवसाद से भर उठते हैं । उपन्यास में हम पारम्परिक रंगमंच के एक ऐसे युग से भी साक्षात्कार करते हैं, जो आज हमें अकल्पनीय लगता है ।

  • av Noor Zaheer
    415,-

  • av Manzoor Ehtesham
    415,-

    NA

  • av Vibhuti Narayan Rai
    445

  • av Kailash Wankhede
    415,-

  • av Prabhat
    445

  • av Harishankar Parsai
    445

  • - Premchand
    av Madan Gopal
    499,-

  • av Rahi Masoom Raza
    399,-

    Set in Aligarh in the early 1960s, after the dust of Partition had ostensibly settled, Topi Shukla is an intriguing story about two friends--one Hindu and one Muslim.

  • av Leeladhar Jagudi
    415,-

  • av Vyomesh Shukla
    399,-

  • av Jitendra Srivastava
    415,-

Gör som tusentals andra bokälskare

Prenumerera på vårt nyhetsbrev för att få fantastiska erbjudanden och inspiration för din nästa läsning.